Parole और Bail में क्या अंतर है?

Parole और Bail में क्या अंतर है?

जब भी किसी व्यक्ति का नाम किसी आपराधिक गतिविधि या मामले में आता है और वह न्यायिक हिरासत में जाता है, तब अक्सर Bail (जमानत) और Parole (पैरोल) जैसे कानूनी शब्द सुनने को मिलते हैं। आम भाषा मे दोनों का अर्थ लगभग एक जैसा ही लगता है, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में व्यक्ति को जेल से बाहर आने का मौका मिलता है।

लेकिन कानूनी दृष्टि से Bail और Parole दो काफी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। दोनों का ही उद्देश्य, लागू होने की स्थिति, प्रक्रिया, अवधि और कानूनी आधार अलग-अलग हो सकते हैं।

lawhelp4you के इस ब्लॉग के माध्यम से हम समझने का प्रयास करेंगे कि Bail क्या है, Parole क्या है, Bail और Parole में क्या अंतर है, प्रक्रिया क्या होती है और कौनसी कब लागू होगी।

Bail (जमानत) क्या होती है?

Bail यानी जमानत एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी ऐसे व्यक्ति को, जो किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है, उसे कुछ शर्तों के आधार पर जेल से रिहा किया जा सकता है। मतलब जब किसी व्यक्ति को किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया जाता है, तो कानून में उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार वह जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

जमानत का यह आशय नहीं है कि उस व्यक्ति को मामले से बरी कर दिया गया है। इसका अर्थ केवल इतना है कि मुकदमे की कार्यवाही के दौरान व्यक्ति को निर्धारित शर्तों के अधीन हिरासत से बाहर रहने की अनुमति मात्र दी गई है। इसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि आरोपी मुकदमे की कार्यवाही के दौरान कानून के सामने उपस्थित होता रहे।

जमानत मिलने के बाद आरोपी को आमतौर पर कुछ निम्नलिखित शर्तों का पालन करना पड़ता है, जैसे:

• न्यायालय के समक्ष निर्धारित तिथि पर उपस्थित होना।

• गवाहों को प्रभावित या धमकाने का प्रयास न करना।

• सबूतों से छेड़छाड़ करने का प्रयास षन करना।

• न्यायालय द्वारा लगाई गई अन्य शर्तों का पालन करना।

जैसे:- किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज हुआ और उसे पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है। जांच और कानून की प्रक्रिया के दौरान वह व्यक्ति जेल में है। यदि कानूनी प्रावधानों के अनुसार वह व्यक्ति जमानत के लिए पात्र है, तो संबंधित न्यायालय के समक्ष Bail Application दाखिल किया जा सकता है। और यदि न्यायालय द्वारा जमानत स्वीकार कर ली जाती है और निर्धारित शर्तें पूरी की जाती हैं, तो व्यक्ति जेल से बाहर आ सकता है और मुकदमे की कार्यवाही में निर्देशानुसार भाग ले सकता है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि न्यायालय द्वारा वह व्यक्ति निर्दोष साबित कर दिया गया है।

Bail कब मिल सकती है?

अपराध की प्रकृति और लागू कानून के आधार पर जमानत के लिए अलग-अलग प्रावधान होते हैं। कुछ मामलों में अपराध bailable होता है, जबकि कुछ मामलों में अपराध non-bailable होता है। Bailable offence में लागू कानून की शर्तें पूरी होने पर आरोपी को जमानत का अधिकार प्राप्त हो सकता है।

Non-bailable offence का मतलब यह नहीं है कि जमानत बिल्कुल नहीं मिल सकती। इसमें जमानत स्वतः अधिकार के रूप में उपलब्ध नहीं होती, बल्कि ऐसे मामलों में संबंधित न्यायालय परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर जमानत देने पर विचार कर सकता है।

Bail देते समय परिस्थितियों के अनुसार कुछ निम्नलिखित बातों पर विचार किया जा सकता है:-

• आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोप

• अपराध की प्रकृति और उसकी गंभीरता

• उपलब्ध सामग्री

• आरोपी के फरार होने की संभावना

• गवाहों को प्रभावित करने की संभावना

• सबूतों से छेड़छाड़ करने की आशंका

• आरोपी का पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड, जहां प्रासंगिक हो

• जांच की स्थिति

• हिरासत की आवश्यकता

• तथा अन्य संबंधित परिस्थितियां।

हर मामले के तथ्य अलग होते हैं, इसलिए Bail का निर्णय भी मामले-विशेष पर निर्भर करता है।

Bail के प्रमुख प्रकार

भारतीय कानून में परिस्थितियों के अनुसार जमानत के कई रूप देखने को मिलते हैं:-

1. Regular Bail

जब कोई व्यक्ति गिरफ्तार होकर हिरासत में है और वह मुकदमे के दौरान जेल से बाहर आने के लिए जमानत मांगता है, तो परिस्थितियों के अनुसार Regular Bail का आवेदन किया जा सकता है।

2. Anticipatory Bail

यदि किसी व्यक्ति को यह आशंका हो कि किसी गैर-जमानती अपराध के मामले में उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, तो लागू कानूनी प्रावधानों के तहत वह गिरफ्तारी से पहले ही अग्रिम जमानत के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकता है।

3. Interim Bail

कुछ परिस्थितियों में न्यायालय द्वारा सीमित अवधि के लिए अस्थायी जमानत दी जा सकती है। इसे Interim Bail कहा जाता है।

4. Default/Statutory Bail

यदि जांच एजेंसी निर्धारित कानूनी अवधि के भीतर जांच पूरी करके आवश्यक रिपोर्ट/चार्जशीट दाखिल नहीं करती है, तो कानून में निर्धारित शर्तों के अधीन आरोपी को वैधानिक या डिफॉल्ट बेल का अधिकार प्राप्त हो सकता है। हालांकि, हर मामले में लागू समय-सीमा और शर्तें अपराध तथा संबंधित कानून पर निर्भर करती हैं।

 

Parole (पैरोल) क्या होती है?

Parole सामान्यतः ऐसे कैदी को निर्धारित शर्तों और सीमित अवधि के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों में जेल से बाहर जाने की अनुमति है, जो पहले से सजा काट रहा है। यह Bail से अलग व्यवस्था है। पैरोल का उद्देश्य और नियम संबंधित कानून एवं राज्य के जेल नियमों तथा सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर कर सकते हैं।

कुछ परिस्थितियों में कैदी को विशेष मानवीय या पारिवारिक परिस्थितियों में पैरोल पर विचार किया जा सकता है। जैसे:

• परिवार में किसी करीबी व्यक्ति की गंभीर बीमारी या मृत्यु।

• किसी महत्वपूर्ण पारिवारिक परिस्थिति में उपस्थित होने की आवश्यकता।

• अन्य विशेष मानवीय या निर्धारित परिस्थितियां जिन्हें संबंधित नियमों में मान्यता प्राप्त हो।

हालांकि, हर कैदी को प्रत्येक परिस्थिति में Parole मिलना स्वतः अधिकार नहीं होता। इसके लिए संबंधित नियमों के अनुसार आवेदन और परिस्थितियों का परीक्षण किया जाता है। तत्पश्चात सक्षम प्राधिकारी द्वारा विचार किया जाता है।

Parole मिलने का अर्थ यह कतई नहीं है कि :

• उसकी सजा समाप्त हो गई;

• या उसे अपराध से बरी कर दिया गया;

• या उसका conviction खत्म हो गया;

• या उसे स्थायी रूप से जेल से मुक्त कर दिया गया।

Parole सामान्यतः अस्थायी और निर्धारित शर्तों के अधीन रिहाई होना होती है। पैरोल की अवधि पूरी होने पर कैदी को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वापस जेल में लौटना होता है। यदि पैरोल की निर्धारित शर्तों का उल्लंघन किया जाता है, तो संबंधित नियमों के अनुसार उसके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।

भारत में जेल प्रशासन और कैदियों से संबंधित कई प्रक्रियाएं सभी राज्यों में समान नहीं होती हैं। यह राज्य के नियमों से प्रभावित होती हैं। इसलिए Parole की पात्रता, अवधि, आवेदन की प्रक्रिया और शर्तों में राज्यों के बीच अंतर हो सकता है।

इसलिए किसी भी कैदी की Parole के लिए सामान्य जानकारी के आधार पर निर्णय लेने के बजाय संबंधित राज्य में लागू वर्तमान जेल नियमों को जानना आवश्यक है।

पैरोल देते समय परिस्थितियों के अनुसार निम्नलिखित बातों पर विचार किया जा सकता है:

• कैदी की पात्रता

• जेल में कैदी का आचरण

• सजा की प्रकृति

• पैरोल मांगने का कारण 

• कैदी की पारिवारिक या मानवीय परिस्थितियां

• कैदी के बारे में जेल प्रशासन की रिपोर्ट

• कानून और संबंधित जेल नियमों में निर्धारित प्रतिबंध

• सक्षम प्राधिकारी की संतुष्टि।

पैरोल (Parole) के अलावा एक प्रक्रिया Furlough भी है जिसे ज्यादातर लोग पैरोल ही समझते हैं क्योंकि यह भी कैदी की अस्थाई रिहाई से ही जुडी हुई है। लेकिन Parole में सामान्यतः किसी विशेष परिस्थिति या निर्धारित आधार पर अस्थायी रिहाई होती है। जबकि Furlough में कुछ जेल नियमों के तहत कैदी को उसके आचरण और निर्धारित पात्रता के आधार पर समय-समय पर दी जाने वाली अस्थायी रिहाई हो सकती है। दोनों के ही नियम राज्य और लागू जेल कानूनों के अनुसार अलग हो सकते हैं।

निष्कर्ष

Bail और Parole दोनों ही जेल से बाहर आने से संबंधित कानूनी व्यवस्थाएं हैं, लेकिन इनका उद्देश्य, समय और कानूनी आधार अलग-अलग है। Bail का संबंध मुख्यतः आपराधिक मुकदमे के दौरान आरोपी की हिरासत से रिहाई से होता है, जबकि Parole का संबंध सामान्यतः सजा काट रहे कैदी को निर्धारित परिस्थितियों में सीमित अवधि के लिए जेल से बाहर आने की अनुमति से होता है। इसी प्रकार Furlough भी Parole से अलग अवधारणा है, जिसके अपने नियम और पात्रता हो सकती है।

 

इसलिए किसी भी व्यक्ति के मामले में सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि उसकी व्यक्ति की स्थिति क्या है—क्या वह केवल गिरफ्तार हुआ है, मुकदमा लंबित है या दोषसिद्ध हो चुका है या सजा काट रहा है। इसी के आधार पर यह निर्धारित किया जा सकता है कि Bail, Parole, Furlough या कोई अन्य कानूनी उपाय प्रासंगिक है। उसके बाद किसी वास्तविक मामले में आवेदन करने से पहले न्यायालय के आदेश और संबंधित राज्य के वर्तमान नियमों की जांच करना उचित है।

 

किसी भी मामले में कानूनी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता उस मामले की प्रक्रिया और उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करती है। और वकील/अधिवक्ता न्यायालय के समक्ष आवेदन और संबंधित कानूनी तर्क प्रस्तुत कर कानूनी अधिकारों के संबंध में सहायता कर सकता है। इसलिए वास्तविक मामले में योग्य अधिवक्ता से कानूनी सलाह लेना उचित है।

 

नोट: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से है। कि

भी मामले में योग्य अधिवक्ता से कानूनी सलाह लेना उचित होता है।